सोमवार, 24 जनवरी 2011



पारो के दो लड़के थे ,
कभी नहीं वे पढ़ते थे |
दिन भर लड़ते रहते थे ,
गाली बकते रहते थे |
पारो था पैसे वाला ,
पारो था पूरा लाला |
कहता पढ़ना है बेकार ,
पढ़ने में क्या रखा यार |
मेरे जो दो लड़के हैं ,
लड़ने दो जो लड़ते हैं |
मुझको नहीं पढ़ाना है ,
नौकर नहीं बनाना है |
यह दुकान पर बैठेंगे ,
दूने पैसे         ऐंठेगे |
और उधर उसके सुकुमार ,
मचा -मचा कर हाहाकार |
धीरे धीरे बड़े हुए ,
और ठूठ से खड़े हुए |
अ आ इ ई उ ऊ ए ,
उन्हें नहीं कुछ मालूम थे |
ए बी सी डी ई एफ जी
उनके लिए भैसें थीं
गुणा भाग में कोरे थे ,
लड़के क्या थे बौरे थे |
नाम थे छोटे और बड़े ,
दोनों ही थे चिकने घड़े |
उनकी भी  बारात  हुई ,
होना था हर बात हुई |
खूब हुए लड़के लड़की ,
नहीं थी बच्चों की कड़की |  
चढ़ा जो पारो का पारा
किया एक दिन बंटबारा |
पारो ने दूकान नयी ,
बड़े पुत्र को खुलबायी |
छोटे को घर खेत दिए ,
और कहा तुम ये करिए 



खुली बड़े की जो दुकान
बिकता उसमें सब सामान |  
लेकिन बड़े निरक्षर था ,
भैस बराबर अक्षर था | 
पैसा जोड़ नहीं पाता ,
ग्राहक उसको ठग जाता |
जो उधार ले जाता था ,
वापस नहीं चुकाता था |
धीरे धीर सब सामान , 
हुआ दोस्तों अंतर्ध्यान |
सारा पैसा हवा हुआ ,
बड़े को घाटा बड़ा |
 अब छोटे का हाल सुनो , 
हुआ बहुत बेहाल सुनो |
मेहनत उको भाती थी ,
खेती करना आती थी |
लिए फावड़ा और कुदाल ,
जुटा ही रहता पूरे साल |
फसल उगाता था बढ़िया ,
दाम कमाता था बढ़िया |  
मन में करके एक विचार 
 गन्ने की, की  पैदावार |
गन्ना जभी जवान हुआ ,
छोटे को अभिमान  हुआ |





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